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वोट नहीं वोटर की सोचो

-राजेंद्र शर्मा-

 

देश के कई हिस्सों में बीमारियों और कुपोषण से मरे हजारों बच्चों पर बेरुखी शर्मनाक….

 

 

आधुनिक युग में मैकाले को सर्वश्रेष्ठ नीतिज्ञ माना जाता है। मैकाले चाणक्य को सर्वश्रेष्ठ नीतिज्ञ मानते हैं। तो, चाणक्य ने शुक्राचार्य को सबसे बड़ा नीति शास्त्री माना। शुक्राचार्य ने अपने ग्रंथ शुक संहिता में कहा है ‘नीतिवान् नहीं कोई राम समाना’ यानी इस धरा पर राम के समान नीतिज्ञ कोई नहीं हुआ, न होगा। राम का जब राज्याभिषेक हुआ तब लक्ष्मण ने जिज्ञासावश नीति के संबंध में उनसे प्रश्न किया। इस पर राम ने कहा कि श्रेष्ठ राजा वही है जो अधिकारों की इच्छा न रखते हुए प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्ण समर्पण और सत्यनिष्ठा के साथ निर्वहन करे। साथ ही, उन्होंने कर्तव्य के बारे में बताया कि राजा यदि प्रजा के धन, स्त्री, जीवन, स्वास्थ्य और शांति की रक्षा न कर सके तो उसे राजा बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। नीति यही कहती है कि ऐसे राजा को तुरंत सिंहासन त्याग देना चाहिए। चाणक्य ने कहा प्रत्येक युग में श्रीराम की नीति अनुकरणीय है और हर काल में रहेगी। अलबत्ता, इसे कौन राजा मानता है और कौन नहीं, यह राजा की शुचिता और सत्यनिष्ठा पर निर्भर है।

 

 

देश के वर्तमान हालात में धन, स्त्री, जीवन और शांति की बात बाद में कभी करेंगे, फिलहाल बात करते हैं स्वास्थ्य की। तो, ताज़ा बानगी है, राजस्थान के जोधपुर यानी सनसिटी के उम्मेद अस्पताल की। जहां दो डॉक्टर ऑपरेशन थियेटर में एक सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान लड़ पड़े। परस्पर मवालियों वाली भाषा का इस्तेमाल किया। नतीजतन, एक नवजात का जीवन शुरू होने से पहले ही खत्म। इसी अस्पताल का पुराना रिकॉर्ड भी उजला नहीं रहा। यहां नवजात बच्चों को चूहे कुतर चुके हैं। तो, फरवरी 2011 में फंगसयुक्त ग्लूकोज लगने से एक दर्जन प्रसूताओं की मौत हो चुकी है। इधर, राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में स्वाइन फ्लू मरीज सत्तारूढ़ दल की विधायक कीर्तिकुमारी की हालत बिगडऩे पर उन्हें प्राइवेट अस्पताल ने जाया गया, मगर बचाया नहीं जा सका। जहां सत्तारूढ़ दल के विधायक की जान बचाने में अमला नाकाम हो जाए, वहां आमजन की स्थिति के बारे में तो सोचकर सिहरन दौड़ जाती है। निपटने की नाकामी के कारण स्वाइन फ्लू तो अब मौसमी रहा नहीं, तो बारहमासी कुपोषण भी कई घरों के चिराग बुझा चुका है।

कुपोषण से बुझ गए सैकड़ों चिराग…

 

एक ओर भारत एक सितंबर को राष्ट्रीय पोषाहार दिवस मना रहा है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान और झारखंड में कुपोषण यानी मैल्नूट्रिशन भी मौत का सबब बना हुआ है। दोनों प्रदेशों में इसकी शिकार बड़े तौर पर सूबे की आदिवासी जनजातियां रही हैं। हाल ही में राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले में महज 53 दिनों में 81 नवजात कुपोषण के कारण काल के ग्रास बन चुके हैं। गत जुलाई माह में 50 बच्चे कुपोषण ने लील लिए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सन् 2002 में बारां जिले में सहरिया आदिवासी जनजाति के सैकड़ों लोग कुपोषण का शिकार हुए। फरवरी, 2016 तक के दो महीने में प्रदेश के 25 बच्चे कुपोषण के कारण काल के गाल में समा गए, तो उसी माह में बाड़मेर जिले में 11 चिराग इसी कारण बुझ गए। आदिवासी बहुल झारखंड की दास्तां तो और भी दर्दभरी है। वहां बीते दो महीनों में साै से ज्यादा बच्चों की सांसें मैल्नूट्रिशन के कारण बंद हो चुकी हैं। इनमें अकेले अगस्त महीने में करीब 55 घरों के दीपक बुझे हैं।

 

 

देश का सबसे बड़ा सूबा उत्तर प्रदेश भी स्वास्थ्य के प्रति जानलेवा लापरवाहियों से अछूता नहीं है। गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में पिछले तीन दिन में 61 के साथ ही अगस्त महीने में 290 बच्चों की मौत हो चुकी है। इनमें से 77 बच्चे इन्सेफ्लाइटिस वार्ड में काल कवलित हुए, तो 213 बच्चों की मौत नीओनेटल (नवजात शिशुरोग) आईसीयू में हुई। यहां जनवरी, 2017 से अगस्त के बीच 1250 बच्चे मारे जा चुके हैं। बताते चलें कि गोरखपुर सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कर्मक्षेत्र, चुनाव क्षेत्र और धर्मक्षेत्र है। यूपी की ही एक और बात कि दिसंबर, 2015 में नोएडा के जिला अस्पताल में भी जोधपुर के उम्मेद अस्पताल की तरह ही फंगसयुक्त ग्लूकोज की सप्लाई की गई थी। वक्त पर किसी कर्मचारी को पता चल गया, वर्ना हश्र भयानक हो जाता।

हुक्मरानों की बेरुखी…

 

किसी ओर देश की जरा-जरा सी बात पर ट्वीट करने वाले हुक्मरानों की ओर से न तो गोरखपुर और न जोधपुर के लिए कोई हमदर्दी सामने आई। ऐसे मेें यह जानकर किसी शासन या शासक को शायद ही कोई फर्क पडऩे वाला है कि हाल ही में महाराष्ट्र और गुजरात में ही स्वाइन फ्लू से आठ सौ लोगों की सांसें थम चुकी हैं। राजस्थान में भी बीते आठ महीने में स्वाइन फ्लू से विधायक कीर्ति कुमारी समेत 86 की मौत हो चुकी है। इनमें से 81 तो गुजरे महज पांच महीने में काल कवलित हुए हैं। इस अवधि में 910 लोग स्वाइन फ्लू पॉजिटिव पाए गए हैं। यहां यह जानकारी जरूरी है कि गत मार्च माह तक राज्य में स्वाइन फ्लू से पांच मौत हुई थी। इसके बाद महज पांच महीने में 81 लोगों को स्वाइन फ्लू लील चुका है। इन मृतकों में पांच अन्य प्रदेशों के थे। स्वाइन फ्लू से सूबे में सर्वाधिक 21 मौत जयपुर में हुई, वहीं कोटा में 10 लोगों के लिए यह बीमारी काल बनकर आई। यहां सबसे ज्यादा गौरतलब बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की लगातार हो रही मौत के गंभीर प्रश्न को हल्के में लेते हुए कहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि लोग अपने बच्चे दो साल के होते ही सरकार के भरोसे छोड़ दें कि सरकार उनका पालन पोषण कर दे। इधर, राजस्थान में हमेशा की तरह हुक्मरान दावा कर रहे हैं कि स्वाइन फ्लू से निपटने के अस्पतालों में उचित इंतजाम किए जा चुके हैं और अब जांच रिपोर्ट सात घंटे में मिलेगी। इनसे कौन पूछे कि ऐसा करने से आपको पहले किसी ने रोका था क्या?

 

ऐसे नेताओं के लिए कबीर का यह दोहा प्रासंगिक है-
बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि।
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।।

 

 

तमाम बातों, तथ्यों, तर्कों पर गौर करने के बाद यही कहा जा सकता है कि जब भी कोई दुखांतिका हुई, सरकार की तरफ से लीपापोती के बयान आए। कुछ वक्त गुज़रा नहीं कि हालात वही ढाक के तीन पात। प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी ने कहा है न, ‘होता वही है जो हुआ करता है’ हकीकत है। फिर भी, उम्मीद है निरीह जनता को मुल्क के हुक्मरानों से कि कभी तो जागेगी उनकी संवेदना, कभी तो वे क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठकर वोट के लिए नहीं वोट देने वालों के लिए सोचेंगे।

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